केदारनाथ की रूप छड़ी को देवभूमि से बाहर ले जाने पर रोक, मामले की जांच के आदेश

केदारनाथ। भगवान केदारनाथ की ऐतिहासिक रूप छड़ी को राज्य से बाहर ले जाने के विवाद के बीच श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) की बैठक में अहम फैसला लिया गया है। समिति ने तय किया है कि अब केदारनाथ की रूप छड़ी देवभूमि उत्तराखंड से बाहर नहीं जाएगी।

यह फैसला बीकेटीसी की हाल ही में हुई बैठक में लिया गया, जिसमें समिति के सदस्यों ने रूप छड़ी को राज्य से बाहर ले जाने के मामले पर कड़ा विरोध जताया।

धर्मस्व मंत्री ने मांगी जांच रिपोर्ट

इस मामले को लेकर धर्मस्व मंत्री सतपाल महाराज ने बीकेटीसी अध्यक्ष को पत्र भेजकर जांच कर रिपोर्ट देने के निर्देश दिए हैं। पत्र में कहा गया है कि श्री केदारनाथ धाम के रावल द्वारा महाराष्ट्र के नांदेड़ में एक कार्यक्रम के दौरान नए रावल की घोषणा करने और उसमें केदारनाथ की ऐतिहासिक रूप छड़ी तथा अन्य बहुमूल्य पवित्र सामग्रियों को भेजे जाने की खबरें मीडिया में लगातार सामने आ रही हैं।

पत्र में यह भी कहा गया है कि इस प्रकार की गतिविधियां सामान्य नियमों और परंपराओं के विपरीत प्रतीत होती हैं।

परंपराओं के विपरीत बताया गया कदम

धर्मस्व मंत्री ने अपने पत्र में लिखा है कि केदारनाथ धाम के प्रति प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री का विशेष लगाव है और धाम के विकास को लेकर हर गतिविधि पर नजर रखी जाती है। ऐसे में धाम के कपाट खुलने से पहले इस तरह की खबरें सामने आने से देशभर में गलत संदेश जा सकता है।

मंत्री ने मंदिर समिति से कहा है कि पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए जल्द जांच कर विस्तृत रिपोर्ट उपलब्ध कराई जाए।

बीकेटीसी बैठक में सदस्यों ने जताया रोष

बीकेटीसी अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने बताया कि बैठक में समिति के कई सदस्यों ने रूप छड़ी को राज्य से बाहर ले जाने पर नाराजगी जताई। सदस्यों का कहना था कि परंपरा के अनुसार रूप छड़ी को कभी भी देवभूमि से बाहर नहीं ले जाया गया है।

बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि अब भविष्य में रूप छड़ी को उत्तराखंड से बाहर नहीं ले जाया जाएगा।

पहले भी उठ चुका है मामला

रूप छड़ी को देवभूमि से बाहर ले जाने का मुद्दा पहले भी उठ चुका है। वर्ष 2000 में भी इस संबंध में अनुमति मांगी गई थी। उस समय बीकेटीसी के खजांची ने ईओ को भेजी आख्या में बताया था कि रावल ने दक्षिण भारत ले जाने के लिए सामान की सूची दी थी, लेकिन परंपरा के अनुसार मंदिर के खजाने से ऐसी पवित्र वस्तुएं कभी बाहर नहीं दी गईं।

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